घपलों घोटालों भरा ,बीत गया है वर्ष
भूल जाँय अवसाद सब ,मिलजुल बाटें हर्ष
मिलजुल बाटें हर्ष ,कदम से कदम मिलालें
तोड़ र्हाजो सांस उसे हम ,गले लगा लें
माथें पर जो दाग ,मिटें अपयश के मसले
करलें सब संकल्प ,गढ़ें न हबाले घपले
[भोपाल :०१.०१.२०१०]
Saturday, January 1, 2011
Wednesday, November 3, 2010
Tuesday, November 2, 2010
दीप जलाये
साथ साथ पथ पर चलने से
विश्वासों के फूल खिलें हैं
सतत साधना के बदले में
अंतर्मन में भाव जगे हैं
साँस साँस विश्वास जगाकर
मंजिलको मुट्ठी में भर लें
प्राण प्राण में दीप जगाकर
जिजीविषा जीवन में भर लें प्रेम मिलन की रीति चलायें
सदियों से मानती आई जो
घ र घर में अब तक दीवाली
राम रहीमा के घर आँगन
बाँट नहीं पाई खुशहाली
आओ हम दोनों मिल कर के
दुनिया का अंधियारा पीलें
हरे भरे जो घाव सिसकते
पीड़ा पीलें उनको सीलें
प्राण प्राण में preeti jaagaaye
विश्वासों के फूल खिलें हैं
सतत साधना के बदले में
अंतर्मन में भाव जगे हैं
साँस साँस विश्वास जगाकर
मंजिलको मुट्ठी में भर लें
प्राण प्राण में दीप जगाकर
जिजीविषा जीवन में भर लें प्रेम मिलन की रीति चलायें
सदियों से मानती आई जो
घ र घर में अब तक दीवाली
राम रहीमा के घर आँगन
बाँट नहीं पाई खुशहाली
आओ हम दोनों मिल कर के
दुनिया का अंधियारा पीलें
हरे भरे जो घाव सिसकते
पीड़ा पीलें उनको सीलें
प्राण प्राण में preeti jaagaaye
Thursday, September 30, 2010
डॉक्टर आनंद की कुण्डलियाँ
बहुत दिनोंके बाद मैं ,पहुंचा अपने गाँव
सिसक सिसक रोने लगी ,नीम आम की छाँव
नीम आम की छाँव ,सुनाने लगी कहानी
बदल गई हर रीति ,गाँव में रहां न पानी
सूरज अपने नाम ,लिखा लेता हर बोली
खुलते जिसके ओंठ ,उसी के सर पर गोली
अपने ही अब गाँव में ,रहा नहीं सम्मान
अपने ही करने लगे,अपनों का अपमान
अपनों का अपमान ,सभी को प्यारा पैसा
जब भी आता फोन ,बोलते ऐसा बैसा
सोच रहा आनंद ,गाँव अब जाऊँ कैसे
पहले लेता जान ,बाद में गिनता पैसे
खेत मेढ़ खालिहानका ,बदल गया आकार
चकबंदी के हो गए ,सपने सब साकार
सपने सब साकार ,शेष ना ऊसर बंजर
पगडंडी गढ़बाट ,तलैया गायब पोखर
वन बागन से कूक ,न जाने कहाँ खो गयी
मौसम की हर चाल ,विनाशक बीज बो ग़ई
आँखों में तिरता सदा ,अपना प्यारा गाँव
चुल्हा चौका चबूतरा ,जलता हुआ अलाव
जलता हुआ अलाव ,जगाये सबका तन मन
बांटे सबका ताप ,भुलाए सबकी अनबन
हँस हँस अपनी बात ,सनाते रोज़ कहानी
आल्हा ऊदल फाग ,सभी को रटा जबानी
[भोपाल:२०.१०.२००६]
aaoonj
सिसक सिसक रोने लगी ,नीम आम की छाँव
नीम आम की छाँव ,सुनाने लगी कहानी
बदल गई हर रीति ,गाँव में रहां न पानी
सूरज अपने नाम ,लिखा लेता हर बोली
खुलते जिसके ओंठ ,उसी के सर पर गोली
अपने ही अब गाँव में ,रहा नहीं सम्मान
अपने ही करने लगे,अपनों का अपमान
अपनों का अपमान ,सभी को प्यारा पैसा
जब भी आता फोन ,बोलते ऐसा बैसा
सोच रहा आनंद ,गाँव अब जाऊँ कैसे
पहले लेता जान ,बाद में गिनता पैसे
खेत मेढ़ खालिहानका ,बदल गया आकार
चकबंदी के हो गए ,सपने सब साकार
सपने सब साकार ,शेष ना ऊसर बंजर
पगडंडी गढ़बाट ,तलैया गायब पोखर
वन बागन से कूक ,न जाने कहाँ खो गयी
मौसम की हर चाल ,विनाशक बीज बो ग़ई
आँखों में तिरता सदा ,अपना प्यारा गाँव
चुल्हा चौका चबूतरा ,जलता हुआ अलाव
जलता हुआ अलाव ,जगाये सबका तन मन
बांटे सबका ताप ,भुलाए सबकी अनबन
हँस हँस अपनी बात ,सनाते रोज़ कहानी
आल्हा ऊदल फाग ,सभी को रटा जबानी
[भोपाल:२०.१०.२००६]
aaoonj
Wednesday, September 22, 2010
तापमान के तीखे तेवर
जनसंख्या की बाढ़ से ,उपजें जटिल सवाल
तापमान का मचलना ,सबसे बड़ा बबाल
ग्रीन हॉउस के छेद का ,पसर रहा भूगोल
पंख न उसके यदि कटे, आयेगा भूडोल
तापमान का मचलना ,सबसे बड़ा बबाल
ग्रीन हॉउस के छेद का ,पसर रहा भूगोल
पंख न उसके यदि कटे, आयेगा भूडोल
Thursday, September 16, 2010
डॉक्टर आनंद के जनक छंद
चिंता का कारन बना
तापमान का उछलना
ताप ताव ऐसा तपा
बर्फ पिघल पानी बना
प्रकृति हो रही है खफा
घोर प्रदूषण बढ़ रहा
शुद्ध हवा पानी नहीं
जीवन घुल घुल मर रहा
पानी तल गहरा हुआ
दिखा रहे हैं झुनझुना
सर सरिता निर्झर कुआं
यह कैसा अंधेर है
गधे पजीरी खा रहे
कलियुग का यह फेर है
संसद पर हमला करे
सीना ताने रह रहा
फांसी से वो ना डरे
रूप पुजारी का धरो
जप माला छापा तिलक
हत्याएं सौ सौ करो
हुआ चलन संतान का
तोड़ रहे अनुवंध शुचि
रेशम से संवंध का
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